श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

तन्‍नो भवान् प्रणतशोकहराङ्‌घ्रियुग्मो

बद्धान् वियुङ्क्ष्व मगधाह्वयकर्मपाशात्।

यो भूभुजोऽयुतमतंगजवीर्यमेको

बिभ्रद् रुरोध भवने मृगराडिवावीः॥ २९

tanno bhavān praṇataśokaharāṅghriyugmo

baddhān viyuṅkṣva magadhāhvayakarmapāśāt|

yo bhūbhujo'yutamataṃgajavīryameko

bibhrad rurodha bhavane mṛgarāḍivāvīḥ|| 29

अर्थ

भगवन्! आपके चरण-कमल शरणागत पुरुषोंके समस्त शोक और मोहोंको नष्ट कर देनेवाले हैं। इसलिये आप ही जरासन्धरूप कर्मोंके बन्धनसे हमें छुड़ाइये। प्रभो! यह अकेला ही दस हजार हाथियोंकी शक्ति रखता है और हमलोगोंको उसी प्रकार बंदी बनाये हुए है, जैसे सिंह भेड़ोंको घेर रखे॥ २९॥✎ 1707

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1707 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भाव → निष्कामभाव

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