श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजाओंका दूत इस प्रकार कह ही रहा था कि परमतेजस्वी देवर्षि नारदजी वहाँ आ पहुँचे। उनकी सुनहरी जटाएँ चमक रही थीं। उन्हें देखकर ऐसा मालूम हो रहा था, मानो साक्षात् भगवान् सूर्य ही उदय हो गये हों॥ ३२॥✎ 1708
राजदूते ब्रुवत्येवं देवर्षिः परमद्युतिः।
बिभ्रत् पिंगजटाभारं प्रादुरासीद् यथा रविः॥ ३२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजाओंका दूत इस प्रकार कह ही रहा था कि परमतेजस्वी देवर्षि नारदजी वहाँ आ पहुँचे। उनकी सुनहरी जटाएँ चमक रही थीं। उन्हें देखकर ऐसा मालूम हो रहा था, मानो साक्षात् भगवान् सूर्य ही उदय हो गये हों॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 571) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/70/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)