प्रभो! आप स्वयं विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हैं। आपके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेमात्रसे अन्त्यज भी पवित्र हो जाते हैं। फिर जो आपका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ ४३॥✎ 2128
श्रवणात् कीर्तनाद् ध्यानात् पूयन्तेऽन्तेवसायिनः।
तव ब्रह्ममयस्येश किमुतेक्षाभिमर्शिनः॥ ४३
प्रभो! आप स्वयं विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हैं। आपके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेमात्रसे अन्त्यज भी पवित्र हो जाते हैं। फिर जो आपका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 573) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/70/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)