श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सभामें जितने यदुवंशी बैठे थे, वे सब इस बातके लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे थे कि पहले जरासन्धपर चढ़ाई करके उसे जीत लिया जाय। अतः उन्हें नारदजीकी बात पसंद न आयी। तब ब्रह्मा आदिके शासक भगवान् श्रीकृष्णने तनिक मुसकराकर बड़ी मीठी वाणीमें उद्धवजीसे कहा—॥ ४५॥
तत्र तेष्वात्मपक्षेष्वगृह्णत्सु विजिगीषया।
वाचःपेशैः स्मयन् भृत्यमुद्धवं प्राह केशवः॥ ४५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सभामें जितने यदुवंशी बैठे थे, वे सब इस बातके लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे थे कि पहले जरासन्धपर चढ़ाई करके उसे जीत लिया जाय। अतः उन्हें नारदजीकी बात पसंद न आयी। तब ब्रह्मा आदिके शासक भगवान् श्रीकृष्णने तनिक मुसकराकर बड़ी मीठी वाणीमें उद्धवजीसे कहा—॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 573) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/70/45/