श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

संसिक्तवर्त्म करिणां मदगन्धतोयै-

श्‍चित्रध्वजैः कनकतोरणपूर्णकुम्भैः।

मृष्टात्मभिर्नवदुकूलविभूषणस्रग्

गन्धैर्नृभिर्युवतिभिश्‍च विराजमानम्॥ ३२

saṃsiktavartma kariṇāṃ madagandhatoyai-

ścitradhvajaiḥ kanakatoraṇapūrṇakumbhaiḥ|

mṛṣṭātmabhirnavadukūlavibhūṣaṇasrag

gandhairnṛbhiryuvatibhiśca virājamānam|| 32

अर्थ

इन्द्रप्रस्थ नगरकी सड़कें और गलियाँ मतवाले हाथियोंके मदसे तथा सुगन्धित जलसे सींच दी गयी थीं। जगह-जगह रंग-बिरंगी झंडियाँ लगा दी गयी थीं। सुनहले तोरन बाँधे हुए थे और सोनेके जलभरे कलश स्थान-स्थानपर शोभा पा रहे थे। नगरके नर-नारी नहा-धोकर तथा नये वस्त्र, आभूषण, पुष्पोंके हार, इत्र-फुलेल आदिसे सज-धजकर घूम रहे थे॥ ३२॥✎ 2130

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2130 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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