श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

प्राप्तं निशम्य नरलोचनपानपात्र-

मौत्सुक्यविश्‍लथितकेशदुकूलबन्धाः।

सद्यो विसृज्य गृहकर्म पतींश्‍च तल्पे

द्रष्टुं ययुर्युवतयः स्म नरेन्द्रमार्गे॥ ३४

prāptaṃ niśamya naralocanapānapātra-

mautsukyaviślathitakeśadukūlabandhāḥ|

sadyo visṛjya gṛhakarma patīṃśca talpe

draṣṭuṃ yayuryuvatayaḥ sma narendramārge|| 34

अर्थ

जब युवतियोंने सुना कि मानव-नेत्रोंके पानपात्र अर्थात् अत्यन्त दर्शनीय भगवान् श्रीकृष्ण राजपथपर आ रहे हैं, तब उनके दर्शनकी उत्सुकताके आवेगसे उनकी चोटियों और साड़ियोंकी गाँठें ढीली पड़ गयीं। उन्होंने घरका काम-काज तो छोड़ ही दिया, सेजपर सोये हुए अपने पतियोंको भी छोड़ दिया और भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये राजपथपर दौड़ आयीं॥ ३४॥✎ 2130

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2130 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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