प्रभो! केवल जरासन्धको जीत लेनेसे ही हमारा महान् उद्देश्य सफल हो जायगा, साथ ही उससे बंदी राजाओंकी मुक्ति और उसके कारण आपको सुयशकी भी प्राप्ति हो जायगी॥ ४॥
अस्माकं च महानर्थो ह्येतेनैव भविष्यति।
यशश्च तव गोविन्द राज्ञो बद्धान् विमुञ्चतः॥ ४
प्रभो! केवल जरासन्धको जीत लेनेसे ही हमारा महान् उद्देश्य सफल हो जायगा, साथ ही उससे बंदी राजाओंकी मुक्ति और उसके कारण आपको सुयशकी भी प्राप्ति हो जायगी॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.71.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 574) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/71/4/