श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

ते विजित्य नृपान् वीरा आजह्रुर्दिग्भ्य ओजसा।✎ 1186

अजातशत्रवे भूरि द्रविणं नृप यक्ष्यते॥ १४

te vijitya nṛpān vīrā ājahrurdigbhya ojasā|

ajātaśatrave bhūri draviṇaṃ nṛpa yakṣyate|| 14

अर्थ

परीक्षित्! उन भीमसेन आदि वीरोंने अपने बल-पौरुषसे सब ओरके नरपतियोंको जीत लिया और यज्ञ करनेके लिये उद्यत महाराज युधिष्ठिरको बहुत-सा धन लाकर दिया॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1186 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): आजहृर्दिग्भ्य → आजह्रुर्दिग्भ्य

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