परीक्षित्! जब एककी गदा दूसरेकी गदासे टकराती, तब ऐसा मालूम होता मानो युद्ध करनेवाले दो हाथियोंके दाँत आपसमें भिड़कर चटचटा रहे हों या बड़े जोरसे बिजली तड़क रही हो॥ ३६॥
ततश्चटचटाशब्दो वज्रनिष्पेषसन्निभः।
गदयोः क्षिप्तयो राजन् दन्तयोरिव दन्तिनोः॥ ३६
परीक्षित्! जब एककी गदा दूसरेकी गदासे टकराती, तब ऐसा मालूम होता मानो युद्ध करनेवाले दो हाथियोंके दाँत आपसमें भिड़कर चटचटा रहे हों या बड़े जोरसे बिजली तड़क रही हो॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 585) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/72/36/