जरासन्धके जेलसे छूटे हुए राजाओंकी बिदाई और भगवान्का इन्द्रप्रस्थ लौट आना
श्रीशुक उवाच
अयुते द्वे शतान्यष्टौ लीलया युधि निर्जिताः।
ते निर्गता गिरिद्रोण्यां मलिना मलवाससः॥ १
ayute dve śatānyaṣṭau līlayā yudhi nirjitāḥ|
te nirgatā giridroṇyāṃ malinā malavāsasaḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जरासन्धने अनायास ही बीस हजार आठ सौ राजाओंको जीतकर पहाड़ोंकी घाटीमें एक किलेके भीतर कैद कर रखा था। भगवान् श्रीकृष्णके छोड़ देनेपर जब वे वहाँसे निकले, तब उनके शरीर और वस्त्र मैले हो रहे थे॥ १॥
अयुते द्वे शतान्यष्टौ लीलया युधि निर्जिताः।
ते निर्गता गिरिद्रोण्यां मलिना मलवाससः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जरासन्धने अनायास ही बीस हजार आठ सौ राजाओंको जीतकर पहाड़ोंकी घाटीमें एक किलेके भीतर कैद कर रखा था। भगवान् श्रीकृष्णके छोड़ देनेपर जब वे वहाँसे निकले, तब उनके शरीर और वस्त्र मैले हो रहे थे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 586) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/1/