॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.73.12
वयं पुरा श्रीमदनष्टदृष्टयो
जिगीषयास्या इतरेतरस्पृधः।
घ्नन्तः प्रजाः स्वा अतिनिर्घृणाः प्रभो
मृत्युं पुरस्त्वाविगणय्य दुर्मदाः॥ १२
vayaṃ purā śrīmadanaṣṭadṛṣṭayo
jigīṣayāsyā itaretaraspṛdhaḥ|
ghnantaḥ prajāḥ svā atinirghṛṇāḥ prabho
mṛtyuṃ purastvāvigaṇayya durmadāḥ|| 12
अर्थ
भगवन्! पहले हमलोग धन-सम्पत्तिके नशेमें चूर होकर अंधे हो रहे थे। इस पृथ्वीको जीत लेनेके लिये एक-दूसरेकी होड़ करते थे और अपनी ही प्रजाका नाश करते रहते थे! सचमुच हमारा जीवन अत्यन्त क्रूरतासे भरा हुआ था, और हमलोग इतने अधिक मतवाले हो रहे थे कि आप मृत्युरूपसे हमारे सामने खड़े हैं, इस बातकी भी हम तनिक परवा नहीं करते थे॥ १२॥✎ 1709