तुमलोग यह समझ लो कि शरीर और इसके सम्बन्धी पैदा होते हैं, इसलिये उनका नाश भी अवश्यम्भावी है। अतः उनमें आसक्ति मत करो। बड़ी सावधानीसे मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करो और धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो॥ २१॥✎ 1710
भवन्त एतद् विज्ञाय देहाद्युत्पाद्यमन्तवत्।
मां यजन्तोऽध्वरैर्युक्ताः प्रजा धर्मेण रक्षथ॥ २१
तुमलोग यह समझ लो कि शरीर और इसके सम्बन्धी पैदा होते हैं, इसलिये उनका नाश भी अवश्यम्भावी है। अतः उनमें आसक्ति मत करो। बड़ी सावधानीसे मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करो और धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 589) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)