सबने बिना किसी प्रकारके कौतूहलके यह बात मान ली कि राजसूय-यज्ञ करना युधिष्ठिरके योग्य ही है। क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णके भक्तके लिये ऐसा करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उस समय देवताओंके समान तेजस्वी याजकोंने धर्मराज युधिष्ठिरसे विधिपूर्वक राजसूय-यज्ञ कराया; ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें देवताओंने वरुणसे करवाया था॥ १६॥
मेनिरे कृष्णभक्तस्य सूपपन्नमविस्मिताः।
अयाजयन् महाराजं याजका देववर्चसः।
राजसूयेन विधिवत् प्राचेतसमिवामराः॥ १६
सबने बिना किसी प्रकारके कौतूहलके यह बात मान ली कि राजसूय-यज्ञ करना युधिष्ठिरके योग्य ही है। क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णके भक्तके लिये ऐसा करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उस समय देवताओंके समान तेजस्वी याजकोंने धर्मराज युधिष्ठिरसे विधिपूर्वक राजसूय-यज्ञ कराया; ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें देवताओंने वरुणसे करवाया था॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 592) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/74/16/