न इसका कोई वर्ण है और न तो आश्रम। कुल भी इसका ऊँचा नहीं है। सारे धर्मोंसे यह बाहर है। वेद और लोकमर्यादाओंका उल्लंघन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई गुण भी नहीं है। ऐसी स्थितिमें यह अग्रपूजाका पात्र कैसे हो सकता है?॥ ३५॥
वर्णाश्रमकुलापेतः सर्वधर्मबहिष्कृतः।
स्वैरवर्ती गुणैर्हीनः सपर्यां कथमर्हति॥ ३५
न इसका कोई वर्ण है और न तो आश्रम। कुल भी इसका ऊँचा नहीं है। सारे धर्मोंसे यह बाहर है। वेद और लोकमर्यादाओंका उल्लंघन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई गुण भी नहीं है। ऐसी स्थितिमें यह अग्रपूजाका पात्र कैसे हो सकता है?॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 595) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/74/35/