श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

वर्णाश्रमकुलापेतः सर्वधर्मबहिष्कृतः।

स्वैरवर्ती गुणैर्हीनः सपर्यां कथमर्हति॥ ३५

varṇāśramakulāpetaḥ sarvadharmabahiṣkṛtaḥ|

svairavartī guṇairhīnaḥ saparyāṃ kathamarhati|| 35

अर्थ

न इसका कोई वर्ण है और न तो आश्रम। कुल भी इसका ऊँचा नहीं है। सारे धर्मोंसे यह बाहर है। वेद और लोकमर्यादाओंका उल्लंघन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई गुण भी नहीं है। ऐसी स्थितिमें यह अग्रपूजाका पात्र कैसे हो सकता है?॥ ३५॥

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