॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.74.4
न ह्येकस्याद्वितीयस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।
कर्मभिर्वर्धते तेजो ह्रसते च यथा रवेः॥ ४
na hyekasyādvitīyasya brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|
karmabhirvardhate tejo hrasate ca yathā raveḥ|| 4
अर्थ
जैसे उदय अथवा अस्तके कारण सूर्यके तेजमें घटती या बढ़ती नहीं होती, वैसे ही किसी भी प्रकारके कर्मोंसे न तो आपका उल्लास होता है और न तो ह्रास ही। क्योंकि आप सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदसे रहित स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं॥ ४॥✎ 1439