परीक्षित्! मैं यह उपाख्यान तुम्हें बहुत विस्तारसे (सातवें स्कन्धमें) सुना चुका हूँ कि वैकुण्ठवासी जय और विजयको सनकादि ऋषियोंके शापसे बार-बार जन्म लेना पड़ा था॥ ५०॥
वर्णितं तदुपाख्यानं मया ते बहुविस्तरम्।
वैकुण्ठवासिनोर्जन्म विप्रशापात् पुनः पुनः॥ ५०
परीक्षित्! मैं यह उपाख्यान तुम्हें बहुत विस्तारसे (सातवें स्कन्धमें) सुना चुका हूँ कि वैकुण्ठवासी जय और विजयको सनकादि ऋषियोंके शापसे बार-बार जन्म लेना पड़ा था॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 596) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/74/50/