श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

तत्र दुर्योधनो मानी परीतो भ्रातृभिर्नृप।

किरीटमाली न्यविशदसिहस्तः क्षिपन् रुषा॥ ३६

tatra duryodhano mānī parīto bhrātṛbhirnṛpa|

kirīṭamālī nyaviśadasihastaḥ kṣipan ruṣā|| 36

अर्थ

उसी समय अभिमानी दुर्योधन अपने दुःशासन आदि भाइयोंके साथ वहाँ आया। उसके सिरपर मुकुट, गलेमें माला और हाथमें तलवार थी। परीक्षित्! वह क्रोधवश द्वारपालों और सेवकोंको झिड़क रहा था॥ ३६॥

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