॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.75.9
मृदंगशंखपणवधुन्धुर्यानकगोमुखाः ।
वादित्राणि विचित्राणि नेदुरावभृथोत्सवे॥ ९
mṛdaṃgaśaṃkhapaṇavadhundhuryānakagomukhāḥ |
vāditrāṇi vicitrāṇi nedurāvabhṛthotsave|| 9
अर्थ
उस समय जब वे अवभृथ-स्नान करने लगे, तब मृदंग, शंख, ढोल, नौबत, नगारे और नरसिंगे आदि तरह-तरहके बाजे बजने लगे॥ ९॥