श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब प्रद्युम्नजीने हाथ-मुँह धोकर, कवच पहन धनुष धारण किया और सारथीसे कहा कि ‘मुझे वीर द्युमान्के पास फिरसे ले चलो’॥ १॥ उस समय द्युमान् यादवसेनाको तहस-नहस कर रहा था। प्रद्युम्नजीने उसके पास पहुँचकर उसे ऐसा करनेसे रोक दिया और मुसकराकर आठ बाण मारे॥ २॥
यह व्याख्या श्लोक 10.77.1 से 10.77.2 तककी एक साथ है।
स तूपस्पृश्य सलिलं दंशितो धृतकार्मुकः।
नय मां द्युमतः पार्श्वं वीरस्येत्याह सारथिम्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब प्रद्युम्नजीने हाथ-मुँह धोकर, कवच पहन धनुष धारण किया और सारथीसे कहा कि ‘मुझे वीर द्युमान्के पास फिरसे ले चलो’॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 606) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/1/