भगवान्की ऐसी आज्ञा पाकर दारुक रथपर चढ़ गया और उसे शाल्वकी ओर ले चला । भगवान्के रथकी ध्वजा गरुड़चिह्नसे चिह्नित थी। उसे देखकर यदुवंशियों तथा शाल्वकी सेनाके लोगोंने युद्धभूमिमें प्रवेश करते ही भगवान्को पहचान लिया॥ ११॥
इत्युक्तश्चोदयामास रथमास्थाय दारुकः।
विशन्तं ददृशुः सर्वे स्वे परे चारुणानुजम्॥ ११
भगवान्की ऐसी आज्ञा पाकर दारुक रथपर चढ़ गया और उसे शाल्वकी ओर ले चला । भगवान्के रथकी ध्वजा गरुड़चिह्नसे चिह्नित थी। उसे देखकर यदुवंशियों तथा शाल्वकी सेनाके लोगोंने युद्धभूमिमें प्रवेश करते ही भगवान्को पहचान लिया॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 607) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/11/