‘अहो! मेरे भाई बलरामजीको तो देवता अथवा असुर कोई नहीं जीत सकता। वे सदा-सर्वदा सावधान रहते हैं। शाल्वका बल-पौरुष तो अत्यन्त अल्प है। फिर भी इसने उन्हें कैसे जीत लिया और कैसे मेरे पिताजीको बाँधकर ले गया? सचमुच, प्रारब्ध बहुत बलवान् है’॥ २४॥
कथं राममसम्भ्रान्तं जित्वाजेयं सुरासुरैः।
शाल्वेनाल्पीयसा नीतः पिता मे बलवान् विधिः॥ २४
‘अहो! मेरे भाई बलरामजीको तो देवता अथवा असुर कोई नहीं जीत सकता। वे सदा-सर्वदा सावधान रहते हैं। शाल्वका बल-पौरुष तो अत्यन्त अल्प है। फिर भी इसने उन्हें कैसे जीत लिया और कैसे मेरे पिताजीको बाँधकर ले गया? सचमुच, प्रारब्ध बहुत बलवान् है’॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 608) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/24/