श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.77.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 77 · अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

एष ते जनिता तातो यदर्थमिह जीवसि।

वधिष्ये वीक्षतस्तेऽमुमीशश्‍चेत् पाहि बालिश॥ २६

eṣa te janitā tāto yadarthamiha jīvasi|

vadhiṣye vīkṣataste'mumīśaścet pāhi bāliśa|| 26

अर्थ

‘मूर्ख! देख, यही तुझे पैदा करनेवाला तेरा बाप है, जिसके लिये तू जी रहा है। तेरे देखते-देखते मैं इसका काम तमाम करता हूँ। कुछ बल-पौरुष हो, तो इसे बचा’॥ २६॥ मायावी शाल्वने इस प्रकार भगवान्‌को फटकार कर मायारचित वसुदेवका सिर तलवारसे काट लिया और उसे लेकर अपने आकाशस्थ विमानपर जा बैठा॥ २७॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध ज्ञानस्वरूप और महानुभाव हैं। वे यह घटना देखकर दो घड़ीके लिये अपने स्वजन वसुदेवजीके प्रति अत्यन्त प्रेम होनेके कारण साधारण पुरुषोंके समान शोकमें डूब गये। परन्तु फिर वे जान गये कि यह तो शाल्वकी फैलायी हुई आसुरी माया ही है, जो उसे मय दानवने बतलायी थी॥ २८॥ भगवान् श्रीकृष्णने युद्धभूमिमें सचेत होकर देखा—न वहाँ दूत है और न पिताका वह शरीर; जैसे स्वप्नमें एक दृश्य दीखकर लुप्त हो गया हो! उधर देखा तो शाल्व विमानपर चढ़कर आकाशमें विचर रहा है। तब वे उसका वध करनेके लिये उद्यत हो गये॥ २९॥

यह व्याख्या श्लोक 10.77.26 से 10.77.29 तककी एक साथ है।

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