॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.77.31
क्व शोकमोहौ स्नेहो वा भयं वा येऽज्ञसम्भवाः।
क्व चाखण्डितविज्ञानज्ञानैश्वर्यस्त्वखण्डितः॥ ३१
kva śokamohau sneho vā bhayaṃ vā ye'jñasambhavāḥ|
kva cākhaṇḍitavijñānajñānaiśvaryastvakhaṇḍitaḥ|| 31
अर्थ
कहाँ अज्ञानियोंमें रहनेवाले शोक, मोह, स्नेह और भय; तथा कहाँ वे परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण—जिनका ज्ञान, विज्ञान और ऐश्वर्य अखण्डित है, एकरस है (भला, उनमें वैसे भावोंकी सम्भावना ही कहाँ है?)॥ ३१॥