परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे चलायी हुई गदासे वह विमान चूर-चूर होकर समुद्रमें गिर पड़ा। गिरनेके पहले ही शाल्व हाथमें गदा लेकर धरतीपर कूद पड़ा और सावधान होकर बड़े वेगसे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर झपटा॥ ३४॥
तत् कृष्णहस्तेरितया विचूर्णितं
पपात तोये गदया सहस्रधा।
विसृज्य तद् भूतलमास्थितो गदा-
मुद्यम्य शाल्वोऽच्युतमभ्यगाद् द्रुतम्॥ ३४
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे चलायी हुई गदासे वह विमान चूर-चूर होकर समुद्रमें गिर पड़ा। गिरनेके पहले ही शाल्व हाथमें गदा लेकर धरतीपर कूद पड़ा और सावधान होकर बड़े वेगसे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर झपटा॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 610) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/77/34/