श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

एवं रूक्षैस्तुदन् वाक्यैः कृष्णं तोत्त्रैरिव द्विपम्।

गदयाताडयन्मूर्ध्नि सिंहवद् व्यनदच्च सः॥ ७

evaṃ rūkṣaistudan vākyaiḥ kṛṣṇaṃ tottrairiva dvipam|

gadayātāḍayanmūrdhni siṃhavad vyanadacca saḥ|| 7

अर्थ

जैसे महावत अंकुशसे हाथीको घायल करता है, वैसे ही दन्तवक्त्रने अपनी कड़वी बातोंसे श्रीकृष्णको चोट पहुँचानेकी चेष्टा की और फिर वह उनके सिरपर बड़े वेगसे गदा मारकर सिंहके समान गरज उठा॥ ७॥

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