दक्षिणं तत्र कन्याख्यां दुर्गां देवीं ददर्श सः॥ १७
tatrāgastyaṃ samāsīnaṃ namaskṛtyābhivādya ca|
yojitastena cāśīrbhiranujñāto gato'rṇavam|
dakṣiṇaṃ tatra kanyākhyāṃ durgāṃ devīṃ dadarśa saḥ|| 17
अर्थ
वहाँपर विराजमान अगस्त्य मुनिको उन्होंने नमस्कार और अभिवादन किया। अगस्त्यजीसे आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त करके बलरामजीने दक्षिण समुद्रकी यात्रा की। वहाँ उन्होंने दुर्गादेवीका कन्याकुमारीके रूपमें दर्शन किया॥ १७॥
तत्रागस्त्यं समासीनं नमस्कृत्याभिवाद्य च।
योजितस्तेन चाशीर्भिरनुज्ञातो गतोऽर्णवम्।
दक्षिणं तत्र कन्याख्यां दुर्गां देवीं ददर्श सः॥ १७
वहाँपर विराजमान अगस्त्य मुनिको उन्होंने नमस्कार और अभिवादन किया। अगस्त्यजीसे आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त करके बलरामजीने दक्षिण समुद्रकी यात्रा की। वहाँ उन्होंने दुर्गादेवीका कन्याकुमारीके रूपमें दर्शन किया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.79.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 617) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/79/17/