श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.79.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 79 · अथैकोनाशीतितमोऽध्यायः

ततोऽमेध्यमयं वर्षं बल्वलेन विनिर्मितम्।

अभवद् यज्ञशालायां सोऽन्वदृश्यत शूलधृक्॥ २

tato'medhyamayaṃ varṣaṃ balvalena vinirmitam|

abhavad yajñaśālāyāṃ so'nvadṛśyata śūladhṛk|| 2

अर्थ

इसके बाद यज्ञशालामें बल्वल दानवने मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा की। तदनन्तर हाथमें त्रिशूल लिये वह स्वयं दिखायी पड़ा॥ २॥✎ 1714

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1714 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाले → करनेवाले

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