इसके बाद यज्ञशालामें बल्वल दानवने मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा की। तदनन्तर हाथमें त्रिशूल लिये वह स्वयं दिखायी पड़ा॥ २॥✎ 1714
ततोऽमेध्यमयं वर्षं बल्वलेन विनिर्मितम्।
अभवद् यज्ञशालायां सोऽन्वदृश्यत शूलधृक्॥ २
इसके बाद यज्ञशालामें बल्वल दानवने मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा की। तदनन्तर हाथमें त्रिशूल लिये वह स्वयं दिखायी पड़ा॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.79.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 615) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/79/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)