भगवान् बलरामजीने निश्चय किया कि इनका प्रारब्ध ऐसा ही है; इसलिये उसके सम्बन्धमें विशेष आग्रह न करके वे द्वारका लौट गये। द्वारकामें उग्रसेन आदि गुरुजनों तथा अन्य सम्बन्धियोंने बड़े प्रेमसे आगे आकर उनका स्वागत किया॥ २९॥
दिष्टं तदनुमन्वानो रामो द्वारवतीं ययौ।
उग्रसेनादिभिः प्रीतैर्ज्ञातिभिः समुपागतः॥ २९
भगवान् बलरामजीने निश्चय किया कि इनका प्रारब्ध ऐसा ही है; इसलिये उसके सम्बन्धमें विशेष आग्रह न करके वे द्वारका लौट गये। द्वारकामें उग्रसेन आदि गुरुजनों तथा अन्य सम्बन्धियोंने बड़े प्रेमसे आगे आकर उनका स्वागत किया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.79.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 618) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/79/29/