॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.79.5
तमाकृष्य हलाग्रेण बल्वलं गगनेचरम्।
मुसलेनाहनत् क्रुद्धो मूर्ध्नि ब्रह्मद्रुहं बलः॥ ५
tamākṛṣya halāgreṇa balvalaṃ gaganecaram|
musalenāhanat kruddho mūrdhni brahmadruhaṃ balaḥ|| 5
अर्थ
बलरामजीने आकाशमें विचरनेवाले बल्वल दैत्यको अपने हलके अगले भागसे खींचकर उस ब्रह्मद्रोहीके सिरपर बड़े क्रोधसे एक मूसल कसकर जमाया, जिससे उसका ललाट फट गया और वह खून उगलता तथा आर्तस्वरसे चिल्लाता हुआ धरतीपर गिर पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे वज्रकी चोट खाकर गेरू आदिसे लाल हुआ कोई पहाड़ गिर पड़ा हो॥ ५-६॥