॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.80.11
आस्तेऽधुना द्वारवत्यां भोजवृष्ण्यन्धकेश्वरः।
स्मरतः पादकमलमात्मानमपि यच्छति।
किं न्वर्थकामान् भजतो नात्यभीष्टांजगद्गुरुः॥ ११
āste'dhunā dvāravatyāṃ bhojavṛṣṇyandhakeśvaraḥ|
smarataḥ pādakamalamātmānamapi yacchati|
kiṃ nvarthakāmān bhajato nātyabhīṣṭāṃjagadguruḥ|| 11
अर्थ
आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामीके रूपमें द्वारकामें ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरणकमलोंका स्मरण करते हैं, उन प्रेमी भक्तोंको वे अपने-आपतकका दान कर डालते हैं। ऐसी स्थितिमें जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तोंको यदि धन और विषय-सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दे दें तो इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है?’॥ ११॥