श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

गृहं द‍्व्यष्टसहस्राणां महिषीणां हरेर्द्विजः।

विवेशैकतमं श्रीमद् ब्रह्मानन्दं गतो यथा॥ १७

gṛhaṃ dvyaṣṭasahasrāṇāṃ mahiṣīṇāṃ harerdvijaḥ|

viveśaikatamaṃ śrīmad brahmānandaṃ gato yathā|| 17

अर्थ

उनके बीच भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियोंके महल थे। उनमेंसे एकमें उन ब्राह्मणदेवताने प्रवेश किया। वह महल खूब सजा-सजाया—अत्यन्त शोभा-युक्त था। उसमें प्रवेश करते समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्दके समुद्रमें डूब-उतरा रहे हों!॥ १७॥

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