ब्राह्मणदेवता फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए थे। शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल था। देहकी सारी नसें दिखायी पड़ती थीं। स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं॥ २३॥
कुचैलं मलिनं क्षामं द्विजं धमनिसंततम्।
देवी पर्यचरत् साक्षाच्चामरव्यजनेन वै॥ २३
ब्राह्मणदेवता फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए थे। शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल था। देहकी सारी नसें दिखायी पड़ती थीं। स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 622) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/80/23/