जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनिको इस बातका पता चला, तब वे सूर्योदय होनेपर अपने शिष्य हमलोगोंको ढूँढ़ते हुए जंगलमें पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं॥ ३९॥
एतद् विदित्वा उदिते रवौ सान्दीपनिर्गुरुः।
अन्वेषमाणो नः शिष्यानाचार्योऽपश्यदातुरान्॥ ३९
जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनिको इस बातका पता चला, तब वे सूर्योदय होनेपर अपने शिष्य हमलोगोंको ढूँढ़ते हुए जंगलमें पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 623) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/39/