श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

एतदेव हि सच्छिष्यैः कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम्।

यद् वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ॥ ४१

etadeva hi sacchiṣyaiḥ kartavyaṃ guruniṣkṛtam|

yad vai viśuddhabhāvena sarvārthātmārpaṇaṃ gurau|| 41

अर्थ

गुरुके ऋणसे मुक्त होनेके लिये सत्-शिष्योंका इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भावसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेवकी सेवामें समर्पित कर दें॥ ४१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें