श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मसु।

गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये॥ ४३

itthaṃvidhānyanekāni vasatāṃ guruveśmasu|

guroranugraheṇaiva pumān pūrṇaḥ praśāntaye|| 43

अर्थ

प्रिय मित्र! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे, हमारे जीवनमें ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्तिका अधिकारी होता और पूर्णताको प्राप्त करता है॥ ४३॥

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