प्रिय मित्र! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे, हमारे जीवनमें ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्तिका अधिकारी होता और पूर्णताको प्राप्त करता है॥ ४३॥
इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मसु।
गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये॥ ४३
प्रिय मित्र! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे, हमारे जीवनमें ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्तिका अधिकारी होता और पूर्णताको प्राप्त करता है॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 624) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/80/43/