रुक्मिणीजीने कहा—‘विश्वात्मन्! बस, बस। मनुष्यको इस लोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्नताका हेतु बन जाता है’॥ ११॥
एतावतालं विश्वात्मन् सर्वसम्पत्समृद्धये।
अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन् पुंसस्त्वत्तोषकारणम्॥ ११
रुक्मिणीजीने कहा—‘विश्वात्मन्! बस, बस। मनुष्यको इस लोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्नताका हेतु बन जाता है’॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 626) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/11/