श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

एतावतालं विश्‍वात्मन् सर्वसम्पत्समृद्धये।

अस्मिँल्लोकेऽथवामुष्मिन् पुंसस्त्वत्तोषकारणम्॥ ११

etāvatālaṃ viśvātman sarvasampatsamṛddhaye|

asmim̐lloke'thavāmuṣmin puṃsastvattoṣakāraṇam|| 11

अर्थ

रुक्मिणीजीने कहा—‘विश्‍वात्मन्! बस, बस। मनुष्यको इस लोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्‍नताका हेतु बन जाता है’॥ ११॥

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