श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात्।

अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत्।

भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते॥ ३

kimupāyanamānītaṃ brahman me bhavatā gṛhāt|

aṇvapyupāhṛtaṃ bhaktaiḥ premṇā bhūryeva me bhavet|

bhūryapyabhaktopahṛtaṃ na me toṣāya kalpate|| 3

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘ब्रह्मन्! आप अपने घरसे मेरे लिये क्या उपहार लाये हैं? मेरे प्रेमी भक्त जब प्रेमसे थोड़ी-सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते हैं तो वह मेरे लिये बहुत हो जाती है। परन्तु मेरे अभक्त यदि बहुत-सी सामग्री भी मुझे भेंट करते हैं तो उससे मैं सन्तुष्ट नहीं होता॥ ३॥

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