श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

वसुदेवः परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविह्वलः।

स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले॥ ३४

vasudevaḥ pariṣvajya samprītaḥ premavihvalaḥ|

smaran kaṃsakṛtān kleśān putranyāsaṃ ca gokule|| 34

अर्थ

वसुदेवजीने अत्यन्त प्रेम और आनन्दसे विह्वल होकर नन्दजीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें एक-एक करके सारी बातें याद हो आयीं—कंस किस प्रकार उन्हें सताता था और किस प्रकार उन्होंने अपने पुत्रको गोकुलमें ले जाकर नन्दजीके घर रख दिया था॥ ३४॥

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