स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले॥ ३४
vasudevaḥ pariṣvajya samprītaḥ premavihvalaḥ|
smaran kaṃsakṛtān kleśān putranyāsaṃ ca gokule|| 34
अर्थ
वसुदेवजीने अत्यन्त प्रेम और आनन्दसे विह्वल होकर नन्दजीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें एक-एक करके सारी बातें याद हो आयीं—कंस किस प्रकार उन्हें सताता था और किस प्रकार उन्होंने अपने पुत्रको गोकुलमें ले जाकर नन्दजीके घर रख दिया था॥ ३४॥
वसुदेवः परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविह्वलः।
स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले॥ ३४
वसुदेवजीने अत्यन्त प्रेम और आनन्दसे विह्वल होकर नन्दजीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें एक-एक करके सारी बातें याद हो आयीं—कंस किस प्रकार उन्हें सताता था और किस प्रकार उन्होंने अपने पुत्रको गोकुलमें ले जाकर नन्दजीके घर रख दिया था॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 634) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/34/