श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते।

दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः॥ ४५

mayi bhaktirhi bhūtānāmamṛtatvāya kalpate|

diṣṭyā yadāsīnmatsneho bhavatīnāṃ madāpanaḥ|| 45

अर्थ

सखियो! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सब लोगोंको मेरा वह प्रेम प्राप्त हो चुका है, जो मेरी ही प्राप्ति करानेवाला है। क्योंकि मेरे प्रति की हुई प्रेम-भक्ति प्राणियोंको अमृतत्व (परमानन्द-धाम) प्रदान करनेमें समर्थ है॥ ४५॥

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