॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.22
आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्वराः।
आकोटि ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हताः॥ २२
ādāya vyasṛjan kecit sajyaṃ kartumanīśvarāḥ|
ākoṭi jyāṃ samutkṛṣya petureke'munā hatāḥ|| 22
अर्थ
उनमेंसे कितने ही राजा तो धनुषपर ताँत भी न चढ़ा सके। उन्होंने धनुषको ज्यों-का-त्यों रख दिया। कइयोंने धनुषकी डोरीको एक सिरेसे बाँधकर दूसरे सिरेतक खींच तो लिया, परन्तु वे उसे दूसरे सिरेसे बाँध न सके, उसका झटका लगनेसे गिर पड़े॥ २२॥✎ 1716