पाण्डववीर अर्जुनने जलमें उस मछलीकी परछाईं देख ली और यह भी जान लिया कि वह कहाँ है। बड़ी सावधानीसे उन्होंने बाण छोड़ा भी; परन्तु उससे लक्ष्यवेध न हुआ, उनके बाणने केवल उसका स्पर्शमात्र किया॥ २४॥✎ 1716
मत्स्याभासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा च तदवस्थितिम्।
पार्थो यत्तोऽसृजद् बाणं नाच्छिनत् पस्पृशे परम्॥ २४
पाण्डववीर अर्जुनने जलमें उस मछलीकी परछाईं देख ली और यह भी जान लिया कि वह कहाँ है। बड़ी सावधानीसे उन्होंने बाण छोड़ा भी; परन्तु उससे लक्ष्यवेध न हुआ, उनके बाणने केवल उसका स्पर्शमात्र किया॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 640) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)