॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.43
व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः।
गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः॥ ४३
vrajastriyo yad vāñchanti pulindyastṛṇavīrudhaḥ|
gāvaścārayato gopāḥ pādasparśaṃ mahātmanaḥ|| 43
अर्थ
उदारशिरोमणि भगवान्के जिन चरणकमलोंका स्पर्श उनके गौ चराते समय गोप, गोपियाँ, भीलिनें, तिनके और घास लताएँतक करना चाहती थीं, उन्हींकी हमें भी चाह है॥ ४३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३॥✎ 2135