श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

हे कृष्णपत्‍न्य एतन्‍नो ब्रूत वो भगवान् स्वयम्।

उपयेमे यथा लोकमनुकुर्वन् स्वमायया॥ ७

he kṛṣṇapatnya etanno brūta vo bhagavān svayam|

upayeme yathā lokamanukurvan svamāyayā|| 7

अर्थ

द्रौपदीने कहा—हे रुक्मिणी, भद्रे, हे जाम्बवती, सत्ये, हे सत्यभामे, कालिन्दी, शैव्ये, लक्ष्मणे, रोहिणी और अन्यान्य श्रीकृष्णपत्‍नियो! तुमलोग हमें यह तो बताओ कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने अपनी मायासे लोगोंका अनुकरण करते हुए तुमलोगोंका किस प्रकार पाणिग्रहण किया?॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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