॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.84.14
श्रीशुक उवाच
निशम्येत्थं भगवतः कृष्णस्याकुण्ठमेधसः।
वचो दुरन्वयं विप्रास्तूष्णीमासन् भ्रमद्धियः॥ १४
niśamyetthaṃ bhagavataḥ kṛṣṇasyākuṇṭhamedhasaḥ|
vaco duranvayaṃ viprāstūṣṇīmāsan bhramaddhiyaḥ|| 14
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण अखण्ड ज्ञानसम्पन्न हैं। उनका यह गूढ भाषण सुनकर सब-के-सब ऋषि-मुनि चुप रह गये। उनकी बुद्धि चक्करमें पड़ गयी, वे समझ न सके कि भगवान् यह क्या कह रहे हैं॥ १४॥ उन्होंने बहुत देरतक विचार करनेके बाद यह निश्चय किया कि भगवान् सर्वेश्वर होनेपर भी जो इस प्रकार सामान्य, कर्म-परतन्त्र जीवकी भाँति व्यवहार कर रहे हैं—यह केवल लोकसंग्रहके लिये ही है। ऐसा समझकर वे मुसकराते हुए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगे॥ १५॥