श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

मुनय ऊचुः

यन्मायया तत्त्वविदुत्तमा वयं

विमोहिता विश्‍वसृजामधीश्‍वराः।

यदीशितव्यायति गूढ ईहया

अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितम्॥ १६

yanmāyayā tattvaviduttamā vayaṃ

vimohitā viśvasṛjāmadhīśvarāḥ|

yadīśitavyāyati gūḍha īhayā

aho vicitraṃ bhagavadviceṣṭitam|| 16

अर्थ

मुनियोंने कहा—भगवन्! आपकी मायासे प्रजापतियोंके अधीश्‍वर मरीचि आदि तथा बड़े-बड़े तत्त्वज्ञानी हमलोग मोहित हो रहे हैं। आप स्वयं ईश्‍वर होते हुए भी मनुष्यकी-सी चेष्टाओंसे अपनेको छिपाये रखकर जीवकी भाँति आचरण करते हैं। भगवन्! सचमुच आपकी लीला अत्यन्त विचित्र है। परम आश्‍चर्यमयी है॥ १६॥

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