श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

यथा शयानः पुरुष आत्मानं गुणतत्त्वदृक्।

नाममात्रेन्द्रियाभातं न वेद रहितं परम्॥ २४

yathā śayānaḥ puruṣa ātmānaṃ guṇatattvadṛk|

nāmamātrendriyābhātaṃ na veda rahitaṃ param|| 24

अर्थ

जब मनुष्य स्वप्न देखने लगता है, उस समय स्वप्नके मिथ्या पदार्थोंको ही सत्य समझ लेता है और नाममात्रकी इन्द्रियोंसे प्रतीत होनेवाले अपने स्वप्नशरीरको ही वास्तविक शरीर मान बैठता है। उसे उतनी देरके लिये इस बातका बिलकुल ही पता नहीं रहता कि स्वप्नशरीरके अतिरिक्त एक जाग्रत्-अवस्थाका शरीर भी है॥ २४॥

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