परम यशस्वी वसुदेवजी उनका जानेका विचार देखकर उनके पास आये और उन्हें प्रणाम किया और उनके चरण पकड़कर बड़ी नम्रतासे निवेदन करने लगे॥ २८॥
तद् वीक्ष्य तानुपव्रज्य वसुदेवो महायशाः।
प्रणम्य चोपसंगृह्य बभाषेदं सुयन्त्रितः॥ २८
परम यशस्वी वसुदेवजी उनका जानेका विचार देखकर उनके पास आये और उन्हें प्रणाम किया और उनके चरण पकड़कर बड़ी नम्रतासे निवेदन करने लगे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 647) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/28/