वसुदेवजीकी पत्नियोंने सुन्दर वस्त्र, अंगराग और सोनेके हारोंसे अपनेको सजा लिया और फिर वे सब बड़े आनन्दसे अपने-अपने हाथोंमें मांगलिक सामग्री लेकर यज्ञशालामें आयीं॥ ४५॥
तन्महिष्यश्च मुदिता निष्ककण्ठ्यः सुवाससः।
दीक्षाशालामुपाजग्मुरालिप्ता वस्तुपाणयः॥ ४५
वसुदेवजीकी पत्नियोंने सुन्दर वस्त्र, अंगराग और सोनेके हारोंसे अपनेको सजा लिया और फिर वे सब बड़े आनन्दसे अपने-अपने हाथोंमें मांगलिक सामग्री लेकर यज्ञशालामें आयीं॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 649) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/45/