स्नान करनेके बाद वसुदेवजी और उनकी पत्नियोंने वंदी-जनोंको अपने सारे वस्त्राभूषण दे दिये तथा स्वयं नये वस्त्राभूषणसे सुसज्जित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे लेकर कुत्तोंतकको भोजन कराया॥ ५४॥✎ 14411442
स्नातोऽलंकारवासांसि वन्दिभ्योऽदात्तथा स्त्रियः।
ततः स्वलंकृतो वर्णानाश्वभ्योऽन्नेन पूजयत्॥ ५४
स्नान करनेके बाद वसुदेवजी और उनकी पत्नियोंने वंदी-जनोंको अपने सारे वस्त्राभूषण दे दिये तथा स्वयं नये वस्त्राभूषणसे सुसज्जित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे लेकर कुत्तोंतकको भोजन कराया॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 650) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1441 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामहृदमें → हृदमें—रामह्रदमें
#1442 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामह्रदमें → ह्रदमें—रामह्रदमें