श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रोऽनुजः पार्था भीष्मो द्रोणः पृथा यमौ।

नारदो भगवान् व्यासः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः॥ ५७

dhṛtarāṣṭro'nujaḥ pārthā bhīṣmo droṇaḥ pṛthā yamau|

nārado bhagavān vyāsaḥ suhṛtsambandhibāndhavāḥ|| 57

अर्थ

परीक्षित्! उस समय राजा धृतराष्ट्र, विदुर, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कुन्ती, नकुल, सहदेव, नारद, भगवान् व्यासदेव तथा दूसरे स्वजन, सम्बन्धी और बान्धव अपने हितैषी बन्धु यादवोंको छोड़कर जानेमें अत्यन्त विरह-व्यथाका अनुभव करने लगे। उन्होंने अत्यन्त स्नेहार्द्र चित्तसे यदुवंशियोंका आलिंगन किया और बड़ी कठिनाईसे किसी प्रकार अपने-अपने देशको गये। दूसरे लोग भी इनके साथ ही वहाँसे रवाना हो गये॥ ५७-५८॥✎ 1441 1442

यह अर्थ श्लोक 57–58 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1441 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामहृदमें → हृदमें—रामह्रदमें
  • #1442 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमें—रामह्रदमें → ह्रदमें—रामह्रदमें

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